•19 August, 2008 •
1 Comment
आंधी की तरह आई थी
वीराने-से मेरे जीवन में
और खुशबू की फिज़ा बनी
मेरे सूने-से आँगन में.
मेरे ह्रदय में खिले सुमन
जैसे वसंत में खिले पलाश.
देखे तेरे चंचल नयन
तुमने बाँधा इक प्रेम-पाश.
जैसे वर्षा की हो फुहार
तेरी बोली में था वो प्यार.
तर कर दे सूखे हिय को
जैसे घन हो जीवन-सार.
तेरे रूप की ज्योति से
उजियाला-सा इक छा जाये,
जैसे मेघाच्छादित नभ में
फिर पीला सूरज आ जाये.
Posted in Uncategorized
•9 August, 2008 •
Leave a Comment
कुछ दिनों से हर कहीं छाया धुआँ सा लगता है
वो चमकता सूरज भी मद्धम हुआ सा लगता है
नयी परतें भी उतर गईं इन दीवारों के रंगों की
स्याह रंग से पुता हर कमरा कुआँ सा लगता है
शिकायत करते हैं अब तो पत्ते और कोपल भी
बिना भंवर तो हर फूल अनछुआ सा लगता है
क्या-क्या अपने शौक़ थे,अब रहा नहीं शुमार
ताज़ा ग़ज़ल का भी मिसरा सुना सा लगता है
आखिर उनींदी पलकों से क्यों अदावत है तुझे
जागते पल में प्यारा सपना लुटा सा लगता है
Posted in Uncategorized
•8 August, 2008 •
Leave a Comment
हज़ारों ऐसे फासले थे जो तय करने चले थे
उन दो लम्हों में तमाम उम्र पा लेने चले थे
कुर्बत-ए-आशियाँ-ए-मुहब्बत की चाह से
हम दो चिड़ियों का नीड़ बना लेने चले थे
उस अकेली राहे-गुज़र पर पैरों की छाप से
हम लम्बे कारवाँ इश्क के रवाँ करने चले थे
क्या फ़िक्र दौलतों की औ क्या टुकड़े चाँद के
ज़िन्दगी के खज़ाने से प्यार चुरा लेने चले थे
गुज़ारिश किया करते रब से सबके ख़ैर की
उस रोज़ बस अपने लिए दुआ करने चले थे
Posted in Uncategorized
•8 August, 2008 •
3 Comments
क्या याद है तुम्हें वो मंज़र?
जुलाई की शाम और रिमझिम बारिश,
कमरे की खिड़की और सामने बालकनी
और तभी तुमपर नज़र पड़ी.
हाथों से बूंदों को पकड़ती तुम
रेलिंग से लटकती बूंदों को छूती.
ऊँगली फिराती और उनको गिराती,
जैसे टूटती हो मोती की माला
और खिलखिलाकर हँसी थी तुम.
गमले के पौधे पे नज़र पड़ी.
मन मचला उसे भी छूने को.
खिलते गुलाब की पंखुडियों को
धीरे से तुमने छुआ था फिर.
हथेली पर इक बूँद गिरी नन्ही,
जैसे स्फटिक कोई निर्मल,
और पिघलकर फैलती वो
प्यारी छोटी पानी की बूँद.
बरबस मुझको देखा था
तुम्हें निहारते हुए उस पल
और शरमाई थी फिर तुम.
ज्यों पकड़ी गयी कोई चोरी
फिर हौले से मुस्कराकर
बालों को तुमने झटका था
और भाग गयी घर के भीतर.
क्या याद है वो पहली नज़र ?
Posted in Uncategorized
•7 August, 2008 •
Leave a Comment
ना दिये से, ना शमा से और ना आफ़ताब से
कोना था दिल का रौशन महबूब के शबाब से
ना ग़ज़ल से, ना धुएँ से और ना शराब से
रंगीन थीं महफिलें उस हुस्न-ए-लाजवाब से
ना आँचल से, ना पर्दे से और ना नक़ाब से
हुस्न छुपे कैसे, रब ने बनाया इस हिसाब से
ना नज्म से, ना मोती से और ना महताब से
बस नूर चुराते रहे उस सूरत-ए-नायाब से
ना ज़हर से, ना छुरे से और ना तेज़ आग से
उन्होंने मार डाला बस इक तल्ख़ जवाब से
Posted in Uncategorized
•7 August, 2008 •
Leave a Comment
इक अजीब रम्ज़ तू, इक हसीन ख़्वाबहै
किसी परी की नज़्म तू,चाहत की किताब है
स्याह रातों के अंधेरों को जो रौशन करे
तेरी आँखें नूरानी,तू दूसरा महताब है
तेरा इक दीदार भी दिल पे वो असर करे
ये हुस्न की चकाचौंध,ये चेहरा आफ़ताब है
क्या चिड़ियों की सरगम,क्या परिंदों की तानें
तेरी हँसी का क़ुदरत में नहीं कोई जवाब है
तेरे नगमे बुनता हूँ , तेरे सपने हैं आँखों में
इक दीवाने शायर का मिला हमें अल्क़ाब है
Posted in Uncategorized
•7 August, 2008 •
Leave a Comment
हम में है कुछ बात ,लो हम आ गए
आओ यारों साथ कि हम आ गए ..
1)हमने था कुछ माँगा, दिल ने था कुछ चाहा
पूरी हुई है ख्वाहिश,ये मंज़िल पा गए
हम में है कुछ …
आओ यारों ..
2)हर राह को है मोड़ा ,हर दिल से साथ जोड़ा
हम जोशीले जवाँ ,हर दिल को भा गए
हम में है कुछ …
आओ यारों ..
3)पैरों धूल उड़ाते चले ,अपने रस्ते बनाते चले
वो मंज़िल हुई पुरानी हम जहां ना गए
हम में है कुछ …
आओ यारों ..
4)अब तारों को तोड़ लाना ,आगे बहुत है जाना
कहेगी दुनिया यही , देखो XLers छा गए
हम में है कुछ …
आओ यारों ..
Posted in Uncategorized